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'कालीधर लापता' रिव्यू: खोए हुए पलों की तलाश और दोस्ती की मीठी कहानी

'कालीधर लापता' रिव्यू: खोए हुए पलों की तलाश और दोस्ती की मीठी कहानी

मधुमिता के निर्देशन में बनी ‘कालीधर लापता’ अभिषेक बच्चन की नई पेशकश है, जो उनकी अपनी तमिल फिल्म ‘केडी ए करुप्पु दुरई’ का हिंदी रीमेक है। हालांकि मूल कहानी बरकरार रखी गई है, लेकिन हिंदी संस्करण में भावनात्मक दृष्टिकोण और प्रस्तुति का अपना अलग ही अंदाज है। फिल्म एक ऐसे शख्स की कहानी है जो न केवल भीड़ में खोया है, बल्कि अपनी पहचान और अस्तित्व के संकट से भी जूझ रहा है।

भावनात्मक लेकिन अधूरी यात्रा

फिल्म की शुरुआत होती है कालीधर (अभिषेक बच्चन) से, जिसे उसके लालची परिवार ने कुंभ मेले की भीड़ में छोड़ दिया है। उसका अतीत धुंधला है और वर्तमान उद्देश्यहीन। इसी बीच उसकी मुलाकात होती है बल्लू (दैविक बाघेला) से, जो सिर्फ 8 साल का है लेकिन ज़िंदगी की पेचीदगियों को बहुत अच्छे से समझता है। एक तरफ कालीधर बीते पलों को पकड़ने की कोशिश करता है, तो दूसरी तरफ बल्लू उसे वर्तमान में जीने की वजह देता है। दोनों के बीच की यह अनोखी दोस्ती फिल्म की आत्मा बन जाती है।

दमदार अभिनय लेकिन कमजोर लेखन

अभिषेक बच्चन ने कुछ बेहद भावुक दृश्य बेहद संवेदनशीलता से निभाए हैं, जैसे एक दृश्य में जब वह बल्लू को खोने के डर से कांप उठते हैं, तो दर्शक उनके डर और असहायता को महसूस कर पाते हैं। लेकिन स्क्रिप्ट उन्हें पूरी तरह उभरने का मौका नहीं देती। उनके किरदार को न तो पर्याप्त संवाद मिले हैं और न ही कोई गहराई। वह शुरुआत से अंत तक खोया ही दिखाई देता है।

दैविक बाघेला बल्लू के किरदार में पूरी फिल्म पर भारी पड़ते हैं। उनका मासूम अभिनय, संवाद अदायगी और भावनात्मक दृश्यों में सहजता इस फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है। वहीं, जीशान अय्यूब जैसे सक्षम कलाकार का किरदार अधूरा और बेमतलब लगता है। उनके हिस्से में कुछ ही दृश्य आते हैं, जो प्रभाव नहीं छोड़ते।

तकनीकी पक्ष में चमक

गैरिक सरकार का कैमरा वर्क और अमित त्रिवेदी का संगीत फिल्म को एक खूबसूरत सौंदर्य देता है। कई दृश्य सिनेमा की बारीकी और भावनात्मकता को मजबूती से पकड़ते हैं। लेकिन स्क्रिप्ट और एडिटिंग इस सजी हुई फिल्म को पीछे खींचते हैं। फिल्म की गति असंतुलित है और कई जगह भावनात्मक गहराई की कमी खलती है। विशेष रूप से, रेलवे स्टेशन पर एक भावुक दृश्य की कमी दर्शकों को खालीपन का एहसास कराती है।

अनुकूलन में असंतुलन

फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरी है – अनुवाद की असावधानी। एक सांस्कृतिक रूप से गहराई वाली तमिल कहानी को हिंदी में उतारते वक्त जो जड़ें और भावनात्मक जुड़ाव जरूरी थे, वे छूट गए हैं। नतीजतन, फिल्म अपने मूल भाव से दूर जाती दिखती है। कालीधर की मानसिक बीमारी, स्मृति हानि और मतिभ्रम जैसे पहलुओं को शुरुआत में उठाया गया है, लेकिन आगे चलकर इन्हें बिना किसी ठोस स्पष्टीकरण के छोड़ दिया जाता है।

निष्कर्ष: भावुक लेकिन अधूरी कहानी

‘कालीधर लापता’ एक ऐसी फिल्म है जो सही इरादों और भावनात्मक दिल से बनाई गई है। अभिषेक बच्चन की यह कोशिश उनके अभिनय के प्रति समर्पण को दर्शाती है, लेकिन सामग्री और लेखन में मजबूती की कमी है। फिल्म में कई खूबसूरत क्षण हैं, लेकिन कुछ अधूरी परतें भी हैं जो दर्शक के मन को पूरी तरह नहीं छू पातीं। बल्लू का किरदार जरूर उम्मीद की एक किरण बनकर उभरता है और यही इस फिल्म की असली जीत है।

रेटिंग: ⭐⭐⭐ (3/5)

देखें अगर: आप भावनात्मक, रिश्तों पर आधारित और बच्चों की मासूमियत से जुड़ी कहानियां पसंद करते हैं।

छोड़ें अगर: आप तेजी से आगे बढ़ती, गहराई से भरी स्क्रिप्ट की तलाश में हैं।

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